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Thursday, 14 July 2016

प्रश्न बनकर रह गया हमारा जीवन

प्रश्न बनकर रह गया हमारा जीवन  

-From google
जब टूट गये थे तार हमारे
रिश्तों पर संवाद हमारे
भीग गया था प्रेम पत्र
ख्वाबों में दूरी दिखती थी
था आसमान में एक तारा फिर भी  
प्रेयशी को प्यारा लगता था  
रात चांदनी में, वह उसके   
रोज उजाला लेकर आता
राहों में उसके दिखता था
बारिश की बूंदों में वह बिखरा
गर्मी के मौसम में वह एक तारा
खोकर भी वह उभरा था
अचानक बारिश में ही आज प्रियतमा
मेरी आँखों में समा गयी
निःशब्द हुआ जब तारा वह
देखा अपनी प्रेयशी को
न उसके जज्बात मिले उससे
न भावों की उसके बरसात दिखी
चली गयी अब वह दूर कही
लगता है, नहीं है प्रेम की डोर बंधी  
फिर छुप गया मैं एक तारा बन वही
बरसात में और विरह के आकाश में
प्रश्न बनकर रह गया हमारा जीवन  
क्यों नहीं हो गया प्रकाशमय .................
-प्रभात