मुझसे जो माँगा मैंने दिया
ये सोंचकर तो नहीं कि मिलेगा
और आपने लिया ये सोंचकर
कि कभी लौटाना नहीं मुझे
कितनी बेकार है ये दुनिया मेरी
मैंने माँगा भी कुछ एक बार अगर
मुझे मिला मगर बदले में उस चीज के
जिसे मैंने भुला दिया था
और उसके साथ ही एक सच
मगर कड़वी बात, जिसे मैं जानता तो था
कि तुम विकसित मानव ही हो और
तुम केवल कुछ देते हो नोट के बदले में
तुमसे सही है वह तुम्हारा नादान बच्चा
जो केवल एक हंसी का रिश्ता जानता है
और खुशी से कुछ मांगने पर
अपने आपको ही गोंद में रख देता है किसी गैर
के.
-प्रभात
