Sunday, 5 January 2020

चाहत की दस्तूर है पूरी तो तशरीफ़ तो होगी

पिछला पोस्ट आप लोगों ने काफी पसंद किया, सराहा भी। उसी के इर्द गिर्द घूमते हुए आगे की कड़ी में एक और पोस्ट यह है-

मोहब्बत की कहानी में कोई और क्यों आएगा
जो हटा नहीं भावों से वो चला क्यों जाएगा
एक मुराद नहीं पूरी तो हमें तकलीफ क्यों होगी
चाहत की दस्तूर है पूरी तो तशरीफ़ तो होगी


तस्वीर ही देखूं तो आंखों से कुछ देखा नहीं जाता
मुसाफिर बन जहां चला था वहां से हिला नहीं जाता
जुनून में चेहरे की रौनक व रंगत बदल सी जाती हैं
गर्म लू से गले की फिजा बदल सी जाती है
बेसहारा जो था सहारे की दरकार कहां होगी
चाहत की दस्तूर है पूरी तो तशरीफ़ तो होगी

यकीनन आजाद हूँ मगर मैं तुम्हारी छांव से नहीं हुआ
छुपा सका खुद को जहां उन घने केशुओ में छुपाया
हश्र आज है जो तन्हाई का कोई इम्तिहान न ले किसी का
सब कुछ बदल जाता है इतिहास बदल जाता है
मगर वो इबादतें नहीं बदलीं तो बात क्या बदलेगी
चाहत की दस्तूर है पूरी तो तशरीफ़ तो होगी
-प्रभात

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