Thursday, 7 December 2017

मैंने जीवन को देखा

मैंने जीवन को देखा है खूब गहरी खाई से
बैठा था आसमान पर, जमीनी सच्चाई से
मैं पृथक नहीं हूं क्षण भर, बाधाओं के आने से
अपने दिल की गलियों में पत्थर मारे जाने से
टूटा और हारा बहुत हूँ, जीता हूँ तो खुद से
कान के तार जुड़े हुए हैं डर लगता है कहने से
वक्त मिलता है सोच समझ कर कुछ कहने को
याद बनाकर अधूरे सपनों को फिर से जीने को
आंखों में आंसू आते है, मन हल्का हो जाता है
नहीं पता, जाते हैं तो फिर अचानक क्यों आते हैं
वो अलग थलग होकर भी नहीं चैन से रह पाते हैं
जिनकी वजह से आंसू आते उन्हें भी क्यों आते हैं
बुलबुला बन कर खो जाऊँगा मैं तुझमें होने से
तुमने छूकर देखा है दिल को बहुत करीब से
-प्रभात

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