Thursday, 20 April 2017

चुटकी भर प्यार

एक समय होता है जब आपसे कोई न कोई यह कहते हुए दिख जाता होगा कि प्यार न करना ।अगर प्यार करना तो कभी ऐसा नही जिसमें तुम या मैं शब्द आये। अगर ऐसा हो जाये कि कोई कहे प्यार होता ही नही कुछ। इन सारी ही परिस्थितियों में आप खुद से प्यार करें ऐसा लोग अक्सर कहेंगे। तो करिए आप ऐसा
आप को एक शीर्षक से यह कविता के रूप में "चुटकी भर प्यार" पूरे प्यार से पढ़ा रहा हूँ .....क्योंकि कोई समझना नही चाहता केवल समझाना ही चाहता है इसलिए ताकि वह भी एक बार ऐसा सोंचने को मजबूर हो जाये जैसा हर कोई पागल इंसान सोंचता होगा । जैसा हर कोई अपने अनुभव में प्यार के लिए यही कहे गए शब्दों का प्रयोग करता है।
*चुटकी भर प्यार*
एक बार सोंचना मां जब नही रह जाती
तो भी छोटी बच्ची देखती है
लाश को उसी ममता की दृष्टि से
जैसे वह पहले देखती थी
-Google image
वह बात करती है उनसे
मां कब, क्या पता बोल दें
वह तब तक नहीं दूर जाना चाहती 

जब तक उसे बल से हटाया नही जाता
उसके प्यार ने मां की लाश
को भी जिंदा ही समझा है
कुछ भी नही बदलता
माँ भी यही करती अगर वह
उस छोटी बच्ची की जगह होती
लेकिन तुम या मैं ऐसा नही करते शायद
इसलिए कि मां का प्यार अलग होता है
नहीं?
कदापि नहीं यह कहना ही सही नही
क्योंकि शायद जिंदा भी है हम
कोई एक मर गया होता
तो संवेदनशीलता दिखती 
मेरा प्यार दिखता तुम्हे
और तुम्हारा मुझे..
अगर ऐसा नहीं हो सकता
तो यही है कि सारी गलतफहमियां
सारी कमियां
मुझमें या तुममें किसी एक में हैं ही
और नाटक ही कुछ ऐसा है
जिसमें तुम्हारी भूमिका में मैं नही
और मेरी तुम नही निभा सकते
और इसलिए ही कहता हूं
कि या तो तुम गलत हो कहीं 
या मैं
दोनों ही सही हो?
हो सकता है वक्त का तकाजा हो
वक्त पर छोड़े तो क्या लगता है?
अब मैं कुछ भी करूँ या तुम करो
क्या होगा....लेकिन फिर भी
मुर्दे की तरह समझ लिया हूँ तुम्हें
मुझे तुम्हारे बोलने का इंतजार रहता है
और तुम्हें भी रहता रहेगा।
लेकिन डर है वैसा ही न हों जाये
जैसा हम दोनों ही नही चाहते।

-प्रभात

प्रेम के शब्द

हवा का अहसास तब तक नही कर पाता जब तक वह किसी वृक्ष की डाली को झुका नही देता। ऊंची गगनचुम्बी इमारतों को गिरा नही देता। और तो और किसी शरीर मे ठिठुरन नहीं पैदा कर देता। इसी तरह से कुछ प्रेम को भी अनुभव किया जा सकता है। प्रेम का अहसास तब ही हो पाता है जब दो दिल किसी वजह से टकरा जाते है। जुड़ते है तो वह प्यार की खूबसूरती या उसकी गंभीरता या इन दोनों की वजह से उत्पन्न एहसास द्वारा अनुभव नहीं ही मिल पाता।
-Google image
अक्सर प्रेम एक ऐसा रोमांचक विषय बनकर मेरे दिलों दिमाग मे सैर किया करता है जहां एक ऐसी नदी बहा करती है जिसमें केवल विष भरा होता है। लेकिन उस विष को पीने के बाद धीरे- धीरे मन आराधक हो जाता है। उपदेशक हो जाता है। मोहित हो जाता है। स्वप्नों की दुनियां में खो जाता है। अक्सर थोड़ी देर के लिए मन सबसे ज्यादा स्थिर इन्ही एहसासों की तरंगों के साथ होता है। जहां इस तरह विचरण करती मनोदशा में अन्य सब कुछ द्वितीयक रूप में दिखने लगता है ।
प्रेम का पाठ किताबों में न तो बचपन में पढ़ा था और न ही अब। मगर प्रेम का खूबसूरत पाठ पिछले कुछ सालों में मैंने भरपूर पढ़ लिया है। हो सकता है आप बचपन में ही पढ़े होंगे। लेकिन एक ऐसे समय के साथ यह पाठ पढ़ने का अलग ही महत्व होता है। ये सच है इश्क हमने नही पढ़ा। यदि इश्क ने लोगों को बर्बाद किया है तो वहीं इश्क ने लोगों को साहित्य पढ़ाया भी है। हो सकता है इश्क ने कोई कहानी खत्म कर दी ही, किसी का जीवन ले लिया हो। लेकिन इश्क ने ही कुछ को इतिहास के पन्नों पर कैद भी किया है। अक्सर इश्क में लोगों को कहते सुना है, प्यार मत करना बहुत बेकार चीज है। शायद ऐसा कहने का आशय ही यही होता है कि इश्क का स्वाद ले ही लिया जाना चाहिए भले ही इश्क कोई करता नहीं यह स्वतः हो जाता है।
#प्रेम के शब्द (जारी है...)

चाहत

गुलमोहर सी खिलती हो
गूगल आभार
सांसों में बसती हो
तुम कितनी भी दूर चले जाओ
यादों में रहती हो

कितने दिन हो गए बात किये, जैसे अरसा बीत गया हो
सावन आया, बासन्ती आया, अब पतझड़ आ गया हो
माना कि कुछ गलती हुई हमसे, अब माफी मांगे क्या
तुम ही तो समझती हो
खामोश हूँ मैं तो तुम क्यों होती हो
तुम धूप में झूमती हो
गुलमोहर सी खिलती हो.....
है बहुत मुश्किल खुद को मनाना, खुद के हिसाब से
तुम्हीं मना लो मुझे, शायद कोई शिकायत न हो हमसे
तकलीफ बहुत है हमसे, प्यार इसे ही कहें क्या
रातों को दिन समझती हो
राह तकता मैं हूँ तो तुम भी तो हो
तुम मेरी मुस्कुराहट हो
गुलमोहर सी खिलती हो.....
एक उम्मीद लिए लिखता हूँ तुम्हें, हासिल हो या न हो
जो भी कहता हूं, तुम पढोगे नहीं, शायद जरूरी न हो
इक राज छुपा है तुमसे, न चाहकर तुम चाहोगी क्या
तुम सपनों में आती हो
हर वक्त शाया बनकर रहती है
तुम मेरी जिंदगी हो
गुलमोहर सी खिलती हो.....

खो जाए सारी पहचान

-Google image 
चाहता हूँ जलना इस दोपहर की लू के साथ
इतना कि कोयले की तरह काला बन जाऊं
इतना कि पत्थरों की तरह खुरदुरा हो जाऊं
इतना कि जल जाए सारी तपती भावनाएं
संवेदनाएं और खो जाए सारी पहचान 
-प्रभात