Saturday, 1 July 2017

माँ की मोहब्बत

माँ की मोहब्बत आज दिख रही है 
फेसबुक पर माँ का नाम लिखकर।
तेवर उनके बदले है पोस्ट में लगता है
लेकिन माँ की याद पर कल कुछ नही लिखोगे...
अक्सर सवाल यही उठ जाते है??
क्यों मां दफन हो जाती है वक्त के साथ साथ??
दिल, दिमाग और बचपन की हिचकियों के साथ??
मां क्यों बंद हो जाती है किताबों में लिखने के बाद??
मां अक्सर नही दिखती घर से निकलने के बाद??
क्यों नही बैठी माँ चूल्हे से निकलकर हमारे पास??
मां अकेले बुड़बुड़ाती है अब भी उसी टूटी खाट से
क्यों नही सोंचते तब कि आखिर मां कहाँ है??
माँ बड़े काबिल हो गए है लोग आजकल
माँ तुम्हे भी लिख रहे है नकल कर चंद पंक्तियों में ..
कोई अहसास दूसरों की चुरा रहा है..
कोई अंदाज दूसरों की लगा रहा है..
कोई तुम्हें केवल मां कह रहा है..
माँ नकली पहचान बन गयी हो बस
शायद तुम किसी और की मां बन गयी हो...
इसलिए दूसरों की अहसास बन गयी हो
मां, अब लगता है ...
तुम मां केवल फ़ेसबुक पर हो गई है।

-प्रभात

आसमान की गोद में रोने लगे हैं....

सितारे खुद की चमक खोने लगे हैं
आसमान की गोद में रोने लगे हैं
मैं भी एक बचपन का सितारा था
अपने प्रियजनों को बहुत प्यारा था
पाकर प्यार अभिमान छा गया था
क्रूद्ध होकर भी शांत हो जाता था
स्नेह में उनके सामान्य हो जाता था
देखो बुझ गया दीपक घर का मेरे
वो पतंगे कोई और घर ढूढ़ने लगे है
अब प्रेम की लौ से बैर करने लगे है
सितारे खुद की चमक खोने लगे हैं
आसमान की गोद में रोने लगे हैं....

-प्रभात

जाने किस अंजाम पर पहुँच गया

 बेखबर होकर मंज़िल ढूंढता रहा रात भर, जाने किस अंजाम पर पहुंच गया
याद आने लगी महीनों बीतें दास्तां की, बिछुड़कर प्रेमिका के पास आ गया
किसी दिन मोहब्बत सजती रही होठों पर, गले मिला और बेचैन हो गया
आखों में नमी देखकर चाहत की, धुँधले से नज़ारे और उसमें मैं खो गया
इश्क़ के पैगाम भेजा उन्हें था, शायद दुबारा भेजने की तकल्लुफ न होगी
सुन लिया मोहब्बत के तराने सारे, अलापा बहुत फिर मैं गगन तले सो गया
बेखबर होकर मंज़िल ढूँढता रहा रात भर, जाने किस अंजाम पर पहुँच गया

-प्रभात

प्रेम के शब्द

पहली मुलाकात
दिल्ली विश्वविद्यालय के केंद्रीय लाइब्रेरी में मिलते है ऐसा कहकर उसने फोन काट दिया लेकिन बहुत देर हो चुकी थी और अभी तक "सुबह" नहीं आया था। "सुरीली" बैठी हुई लाइब्रेरी में घंटों इंतजार करती रही। कभी घड़ी देखती तो कभी कुछ। घड़ी देख ही रही थी देखा सामने "पिंकी" खड़ी थी। अरे पिंका तू क्या कर रही है आश्चर्य से सुरीली ने पूछा। पिंकी ने मजाकिया ढंग से कहा अरे तू किसका इंतजार कर रही है बॉय फ्रेंड का । चल तू जानती नहीं मैं फ्रेंड तो बनाती नही बॉय फ्रेंड की बात ही अलग ही है...मुहँ टेढ़ा बनाते हुए सुरीली ने कटीले अंदाज में पिंकी को खूब सुना दिया। पिंकी ही थी जो इतना सुनाने के बाद फिर पूछा अच्छा ये बता सुरीली अभी किसी का इंतजार तो नही कर रही ...हां कर रही हूं तुझे क्या लेना देना । सुरीली ने इतना कहा तो पिंकी अपने किसी और काम से अपने संस्कृत विभाग की ओर मुड़ गई।
2 घंटे बीत चुके, और फोन में बैटरी चार्ज न होने की वजह से फोन आया और फ़ोन की स्क्रीन पर नाम फ़्लैश किया...; अच्छा सुरीली जी कहाँ पर है...सुबह ने पूछा। अरे सुनो सुभा जल्दी से आ जाओ इतना वेट तो मैंने आज तक किसी बॉय फ्रेंड का भी नही किया, मेरे फोन की बैटरी भी नही है, लाइब्रेरी में मिलूंगी। सुबह ने कहा, हाँ ठीक अभी इंतजार करना । हम मिलेंगे जरूर।
सायं 4 बजे तक पिछले 3 घंटे से इंतजार करते-करते सुरीली थक गयी थी उसे गुस्सा भी आ रहा था लेकिन उसे इंतजार करना भी ज्यादा गंवारा न था। वह बैठी हुई सुबह का रास्ता देखती कभी किताब के पन्ने खोल लेती।
थोड़ी देर बाद सुबह आया तो सुरीली ने यह जरूर कहा कि आ गए, थोड़ी मुस्कुराई मगर थोड़ी बहुत मजाक मजाक में नाराज भी हुई कि आज तो इंतजार करना पड़ा...जो मैं कभी नही करती। सुबह ने कहा तो कुछ नही बस मुस्कुराता रहा...शायद सुबह और सुरीली की इस तरह पहली मुलाकात थी जब केवल एक दूसरे के लिए मिले थे। तुम बहुत कम बोलते हो क्यों? फिर भी सुबह मुस्कुराता ही रहा, जवाब नहीं ही दिया । सुबह मन ही मन बहुत खुश था कि किसी ने आज उसकी वजह से इंतजार तो किया। अच्छा तो लगा मिलकर दोनों को ही। थोड़ी बहुत बाते हुई। लाइब्रेरी से किताब भी लिया तो एक दूसरे को आमने सामने देखकर दोनों खूब मुस्कुराए...आज से जैसे सुबह की जिंदगी में कुछ अच्छी तरह नई शुरुआत थी। बहुत दिनों बाद शायद खुशियों की बारिश हुई थी जिंदगी की घनी गर्मी के बाद...
प्रभात
#प्रेम के शब्द