Thursday, 28 August 2014

मैं नर और न ही नारी हूँ....

कभी पायल पहनती तो कभी होठो को रंगती

और कभी दुपट्टा तो कभी साड़ी में दिखती । 

मैं नर और न ही नारी हूँ

बस मैं यहाँ बेचारी हूँ ।

सोचती हूँ मैं प्यार में डूबूं

मीरा बनूँ या कृष्ण

उनको देखूं या न देखूं,

पर मुझको कैसे प्रेम दिखाते है वे

थोड़ा शर्माती कुछ कहने को होती ।

पर वे देखते है ऐसे जैसे,

मैं लाचारी हूँ, हाँ हूँ पर धीरज न खोती

बस अलग पहचान संजोती ।

खूंटी में बैग टांगती और सिक्को को गिनती

मैं रेलों के डिब्बे में घुसती और गालियाँ देती ।

मैं खुद भिखारी हूँ 

मैं समाज की मैली दुखवारी हूँ ।

चलना मेरा पहचान है ताली दूसरी

मैं अच्छी लगती हूँ हाय कितनी

बहुत समझती हूँ ।

आजाद हुआ था हिन्दुस्तान जब

तब कहाँ थी, पहचान बनाने में ही तो

जो अब कानूनी दस्तावेज़ में लिखा हैं

नया लिंग है मेरा अभी 

मैं अभी जान पाई हूँ ।

मैं जानती हूँ केवल लिखना हो मैं खुद ही लिख लेती

सम्मान चाहिए मुझको अपने अस्तित्व का

कब तक मांगूंगी भीख केवल साथ चीख

यह जानते हुए कि औरत/मर्द का भेद ही यही होती 

मैं छुपती हूँ या चुप रहती हूँ ।

पर यहाँ बेचारी-बेचारी,

मैं तिकोनी आँखों में देखी जाती हूँ...।

                                   -“प्रभात”



9 comments:

  1. Information and solutions in Hindi ( हिंदी में समस्त प्रकार की जानकारियाँ )
    आपकी इस रचना का लिंक दिनांकः 29 . 8 . 2014 दिन शुक्रवार को I.A.S.I.H पोस्ट्स न्यूज़ पर दिया गया है , कृपया पधारें धन्यवाद !

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  2. Replies
    1. शुक्रिया पढ़ने के लिए!

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  3. दयनीय स्थिति वर्णन करती रचना !

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    1. टिप्पणी के लिए शुक्रिया!

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  4. बढ़ियाँ जज़्बात

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